Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
हिमानीकण्टकश्वभ्रशस्त्रपत्रवनानि च ।
स्वकर्मदुष्कृतोत्थानि संप्राप्तानीति पापवान् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
महापापी पुरुष बर्फ की चट्टानें, कटि, गङ्के ओर तलवार की नाई तीक्ष्ण पत्तों से भरपूर वन,
जो कि हमारे दुष्कर्मो से उत्पन्न हैं, हमें प्राप्त हो रहे हैं, ऐसा जानते हैं ॥