Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
ततोऽनुभवतीन्द्वाभं यौवनं मदनोन्मुखम् ।
ततो जरां पद्ममुखे हिमाशनिमिव च्युतम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त वह चन्द्रमा के समान घटने बढ़नेवाले चंचल ओर
मनोहर तथा कामोन्मुख (नारीपरायण) यौवन का अनुभव करता है, फिर कमल के मुँहमें गिरे
हुए तुषाररूपी वज्रकी नाई बुढ़ापे का अनुभव करता है यानी जैसे कमल के उपर तुषाररूपी
वजर गिरकर उसे मुरझा देता है, वैसे ही बुढ़ापे से जर्जर हो जाता है