Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
वृक्षाणामुपलानां या नामान्तःस्थाः स्वसंविदः ।
बुद्ध्यादिविहितान्येव तानि तेषामिति स्थितिः ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि सब वस्तु केवल चिदेकरस ही है, फिर उसमें उससे विरुद्ध जाज्य,
रूप, नाम आदि भेदों का अनुभव सबको कैसे होता है ? तो इस पर कहती हैं।
जो अन्तःकरण में स्थित संवित् है, उन्हीं के वृक्षों के, पर्वतों के जाइय, नाम और रूप
आदि भेदों की रचना की है, ऐसी यथार्थ स्थिति हे । तत्-तत् पदार्थो के भीतर स्थित प्रत्यक्
चैतन्य में अविद्या अध्यस्त बुद्धि की कल्पना से ही यह स्थावर, जंगम आदि या जाड्य, नाम,
रूप आदि भेद होते हैं, यह भाव है