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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 55, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 55, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

जीव इत्युच्यते तस्य नामाणोर्वासनावतः । तत्रैवास्ते स च शवागारे गगनके तथा ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जाता है, वस्तुतः जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है अतएव वासनावश उसको अपने स्थान में ही परलोक गमन आदि का भ्रम होता है। वास्तव मे उसका परलोकगमन आदि नहीं होता । इस आशय से मण्डपाकाशन्याय का स्मरण कराते हैं। वह वहीं पर राजा पद्म के शवागार में मण्डपाकाश में ही रहता है