Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verses 15–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verses 15–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 15-19
संस्कृत श्लोक
ततस्त्यक्तो नभोमार्गे यन्त्रोपल इव च्युतः ।
अथ जीवकला लीला ज्ञप्तिश्चेति त्रयं नभः ॥ १५ ॥
पुप्लुवे जीवलेखा तु रूपिण्यौ ते न पश्यति ।
तामेवानुसरन्त्यौ ते समुल्लङ्घ्य नभस्तलम् ॥ १६ ॥
लोकान्तराण्यतीत्याशु विनिर्गत्य जगद्गृहात् ।
द्वितीयं जगदासाद्य भूमण्डलमुपेत्य च ॥ १७ ॥
ते द्वे संकल्परूपिण्यौ संगते जीवलेखया ।
पद्मराजपुरं प्राप्य लीलान्तःपुरमण्डपम् ॥ १८ ॥
क्षणाद्विविशतुः स्वैरं वातलेखा यथाम्बुजम् ।
सूर्यभासो यथाम्भोजं सुरभिः पवनं यथा ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर क्षेपणीयन्त्र (एक प्रकार के गुलेल) से गिरे हुए पत्थर के समान आकाशभाग में उसे
छोड़ दिया । फिर तो जीवकला, लीला ओर श्रीसरस्वती देवी ये तीनों मूर्तिमती थी, तथापि
राजा विदूरथकी जीवकलाने उन्हें नहीं देख पाया, वे दोनों तो राजा की जीवकला को देखती
ही थी। उक्त जीवकलाका ही अनुगमन कर रही वे दोनों आकाश को लाँघकर अन्यान्य लोकों
का अतिक्रमण कर जगद्रूपी घर से (ब्रह्माण्ड से) निकलकर दूसरे जगत् के (ब्रह्माण्ड में)
पहुँची । दूसरे ब्रह्माण्ड के भूलोक से आकर अपने सत्यसंकल्प से रूप धारण करनेवाली वे
दोनों देविर्यो राजा विदूरथ की जीवकला के साथ राजा पद्म के नगरमें पहुँचकर जैसे कमलमें
वायु और सूर्य की प्रभा प्रवेश करती है ओर सुगन्धि वायु में प्रवेश करती है, वैसे ही एक क्षण में
स्वच्छन्दत के साथ लीला के अन्तःपुर के मण्डप में प्रविष्ट हुई ।