Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कारणेन विनोदेति न कदाचन कस्यचित् ।
भावना काचिदपि नो इति निश्चयवान्भव ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
वत्स श्रीरामचन्द्रजी, आप अपने मन में यह अटल निश्चय कर लीजिये कि कारणभूत
भावना के बिना कभी भी किसी पदार्थ की प्रतीति नहीं होती,जिसको जब जो पदार्थप्रतीति
होगी, वह किसी न किसी भावना से होगी, कारण यदि सत्य हो, तो कार्य की सत्यता हो सकती
है पर भावना तो सत्य नहीं है, सत्य कारण के बिना उत्पन्न हुआ कार्य भी नहीं ही है, अतएव
शुद्ध ब्रह्म ही वस्तुतः है, ऐसे निश्चयवान् होओ