Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 56, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 56, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
एवं परस्परजयाज्जयत्यत्रातिवीयेवान् ।
तस्माच्छुभेन यत्नेन शुभाभ्यासमुदाहरेत् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
धर्म-दान के प्रतिपादक शास्त्रप्रमाण से यह कल्पना होती है कि प्रेत के अन्तःकरणे
उसी समय (धर्मसमर्पणकाल में ही) मैं अमुक धर्मवान हूँ” ऐसी वासना उत्पन्न होती है, ऐसा
कहते हैं।
धर्म देनेवाले की वासना हुई हो, तो उस भावना से क्रमशः प्रेत की मति पूर्ण होती है यानी
शास्त्रवचन के प्रामाण्य से ही दाता की वासना के अनुसार प्रेत को अवश्य फल मिलता है ॥३ ८॥
शंका - प्रेत यदि पाखण्डी हो और वेद के ऊपर द्वेष, नास्तिकता आदि अशुभवासना से
उसका अन्तःकरण दूषित हो, तो बन्धु- बान्धवो द्वारा धर्मसमर्पण करनेपर भी उसे फल मिलता
है या नहीं ?
समाधान - नहीं मिल सकता, यदि प्रेत की बुद्धि शुभ हो, तो तभी उसे बन्धुओं द्वारा
समर्पित धर्म का फल मिल सकता है। यदि वासना की प्रबलता में अर्थसत्यत्व हेतु हो, तो उसे
भी धर्मफल की प्राप्ति होगी, यह भाव है।
इसलिए पूर्व प्रकरण में मैंने पुरुषप्रयत्न की प्रबलता को सिद्ध कर शुभ कर्मो का अभ्यास
ही सदा करना चाहिए, यह कहा है, ऐसा कहते हैं ।
इस प्रकार परस्पर के विजय से अतिबलवान् पुरुषप्रयत्न जीतता है, इसलिए शुभ प्रयत्न
द्वारा शुभाभ्यास करना चाहिए