Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
तस्मिन्प्रदेशे सा पूर्वलीला संस्थाप्य देहकम् ।
ध्यानेन ज्ञप्तिसहिता गताभूदिति वर्णितम् ॥ १० ॥
किमिदानीं स लीलाया देहस्तत्र न वर्णितः ।
किंसंपन्नः क्व वा यात इति मे कथय प्रभो ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
लीला ने पहले जिस स्वरूप को छोड़ा था, उसे उसीका अन्वेषण करना चाहिए था, क्योकि
वह आवश्यक था, उसे छोडकर विदूरथ और लीला के दर्शन का ही पहले वणन क्यो किया ?
इस प्रकार सन्देह होने पर श्रीरामचन्द्रजी जिज्ञासा करते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : प्रभो, पूर्वलीला उस राजमहल के एक भाग में अपनी स्थूल देह
को रखकर ज्ञप्ति के साथ ध्यान से (समाधि से) गई, ऐसा पहले वर्णन हो चुका है इस समय
वहाँ पर लीला की उस देह का वर्णन क्यों नहीं किया ? उस देह का क्या हुआ अथवा वह कहाँ
गई ? यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये