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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । आतिवाहिकतामेति आधिभौतिक एव किम् । उतान्य इति मे ब्रूहि येनोह्य इव भोः प्रभो ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी के उक्त कथन से श्रीरामचन्द्रजी को यह शंका हुई कि यदि योगियों की देह बाधित होती है तो बाधित का अन्य रूप में परिणाम हो नहीं सकता, अतः कहना होगा प्रारब्ध भोग के लिए दूसरा ही आतिवाहिक शरीर उत्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में उसका दूसरा जन्म हो गया फिर वह जीवन्मुक्त कहाँ रहा ? इतना ही नहीं न स भूयोऽभिजायते“ (वह फिर जन्म नहीं लेता) इत्यादि शास्त्र से विरोध भी हुआ। उक्त शंका के समाधान के लिए वे गुरुजी से पूछते हैं। श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, क्या योगी का आधिभौतिक शरीर ही आतिवाहिक बन जाता है अथवा दूसरा ही आतिवाहिक शरीर उत्पन्न होता है । यदि प्रथम पक्ष मानिये, तो बाधित शरीर का दूसरे शरीर में परिणाम होना सभी प्रमाणों से विरुद्ध है। यदि दूसरा पक्ष मानिये तो ज्ञान का फल मुक्ति है, यह शास्त्रसिद्धान्त बाधित होता है । दोनों ही प्रकारों से अनुपपत्ति होने के कारण मैं सन्देहरूपी तेज धारा में बह सा रहा हूँ, कृपया मेरे संशय को दूर कीजिये