Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
तदा गुरुत्वं काठिन्यमिति यश्च मुधा ग्रहः ।
शाम्येत्स्वप्ननरस्येव बोद्धुर्बोधान्निरामयात् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
तब प्रबुद्ध पुरूष के निर्मल
बोध से गुरुता, कठिनता इत्यादि का जो असत् आग्रह है वह भी, स्वप्न देखनेवाले मनुष्य के
निर्मल बोध से स्वप्न के नगर के गुरुत्व, कठिनत्व आदि के समान चला जाता है