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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verses 34–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verses 34–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

अनेकदिनसंकल्पदेहे परिणतात्मनाम् । अस्मिन्देहे शवे दग्धे तत्रैवास्थितिमीयुषाम् ॥ ३४ ॥ लघुदेहानुभवनमवश्यं भावि वै तथा । प्रबोधातिशयादेति जीवतामपि योगिनाम् ॥ ३५ ॥ उदितायां स्मृतौ तत्र संकल्पात्माहमित्यलम् । यादृशः स भवेद्देहस्तादृशोऽयं प्रबोधतः ॥ ३६ ॥ भ्रान्तिरेवमियं भाति रज्ज्वामिव भुजङ्गता । किं नष्टमस्यां नष्टायां जातायां किं प्रजायते ॥ ३७ ॥ श्रीराम उवाच । अनन्तर ये वास्तव्या लीलां पश्यन्ति ते यदि । तत्सत्यसंकल्पतया बुध्यन्ते किमतः प्रभो ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में यह स्वप्न है, इस परिज्ञान से शरीर हल्का हो जाता हे वैसे ही बोध होने से स्थूल के सदृश प्रतीत हो रहा यह शरीर आकाश में गमनसमर्थ हो जाता है ॥३ ३॥ जब ढतर स्थूल वासनावाले अज्ञानी पुरुषों को भी स्थूलशरीर के शव होकर दाह आदि द्वारा नष्ट होने पर पूर्ववर्ती सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है तव वासनाशून्य ज्ञानी जनों को स्थूल शरीर का बाध होने पर स्वाभाविक सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है, इसमें कहना ही क्या है ? ऐसा कहते हैं। जैसे अनेक दिनों के संकल्प से प्राप्त देह को आत्मा समझनेवाले और उसी देह में दुद आत्माभिमान करनेवाले लोगों को इस देह के शव होकर जलाये जाने पर अवश्य सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है वैसे ही योगियों को जीवितावस्था में ही अतिशय ज्ञान होने से सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है