Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
यस्तत्र स्यादिवाबोधस्तदज्ञानमनुत्तमम् ।
सैषासंसृतिरित्युक्ता मिथ्याज्ञानात्मिकोदिता ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो उसमें अन्य-सा प्रतीत होता है, वह अविद्या ही है, वही संसार है, ऐसा कहते है ।
जो उसमें अन्य-सा प्रतीत होता है, वह सबसे बढ़कर अज्ञान है, उसे ही “संसार” कहा
गया है, वह मिथ्याज्ञानरूप ही हे