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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 57, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

न चार्थो भवितुं शक्यः सत्यत्वे स्वप्नतोदितः । संविदो नित्यसत्यत्वं स्वप्नार्थानामसत्यता ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसी बात है तो सहकारी कारणवाले जगत्‌ प्रपच में सत्यता प्राप्त हुई ? इस शंका का समाधान करते हैं। जैसा संवित्रूप स्वप्न है वैसा ही यह जाग्रत्‌ भी संवित्रूप ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। स्वप्न में असत्य नगर की प्रतीति होती है और सृष्टि के आदि में असत्‌ जगत्‌ का भान होता है। भाव यह है कि यद्यपि इस समय सहकारी आदि हैं तथापि आदि सृष्टि में अज्ञानोपहित हिरण्यगर्भ की संवित्‌ से अतिरिक्त कुछ नहीं था, अतः जगत्‌ की स्वप्नतुल्यता हो गई ।५०॥ प्रपंच को यदि सत्य मानो, तो उसमें भी संवित्‌ के समान चित्त्व हो जायेगा, ऐसी स्थिति में उसमें चिद्विषयत्व का व्याघात हो जायेगा, ऐसा कहते है । स्वप्नता यानी स्वरूप के अज्ञान से उदित हुए प्रपंच को यदि सत्य मानो, तो वह संविद्‌- भास्य नहीं होगा ओर दूसरी बात यह भी है कि संवित्‌ का सत्ता से व्यभिचार नहीं हे ओर पदार्थो का उससे व्यभिचार होता है, इसलिए वे सत्य नहीं हो सकते, ऐसा कहते हैँ । संवित्‌ की नित्यसत्यता ओर स्वप्न पदार्थो की असत्यता हे, अतएव प्रपंच सत्य नहीं हो सकता है