Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 28–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verses 28–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
ततो मरणमूर्च्छान्ते पश्यामि परमेश्वरि ।
यावदभ्युदितास्म्याशु प्लुता च गगनोदरे ॥ २८ ॥
भूताकाशेऽनिलरथं समारूढास्म्यहं ततः ।
आनीता गन्धलेखेव तेनाहमिममालयम् ॥ २९ ॥
देवि पश्यामि सदनं नायकेनाभ्यलंकृतम् ।
दीप्तदीपं विविक्तं च महार्हशयनान्वितम् ॥ ३० ॥
पतिमालोकयामीमं यावदेष विदूरथः ।
शेते कुसुमगुप्ताङ्गो मधुः पुष्पवने यथा ॥ ३१ ॥
अथ संग्रामसंरम्भश्रमार्तोऽयं स्वपित्यलम् ।
इति निद्रा मया सेयं देवेश्वरि न वारिता ॥ ३२ ॥
अनन्तरमिमं देशं प्राप्ते देव्याविमे त्विति ।
यथानुभूतं कथितं मदनुग्रहकारिणि ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे परमेश्वरी, तदनन्तर मरणमूछकि बाद मैं क्या
देखती हूँ कि वासना से परिकल्पित देह के तुल्य देहसे मैं अध्यास से आविर्भूत हुई हूँ,
भूताकाश में उड़ी हूँ, तदनन्तर भूताकाश में वायुरुपी रथ में बैठी हूँ ॥ तदनन्तर सुगन्धि के
लेश की नाई वायुरूपी रथ मुझे यहाँ इस घर में लाया