Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 58, Verses 42–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 58, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
उत्तस्थौ प्रोल्लसत्कायो विन्ध्याद्रिर्वृद्धिमानिव ।
उवाच कः स्थित इति घनगम्भीरनिःस्वनम् ॥ ४२ ॥
लीलाद्वयमथास्याग्रे प्रोवाचादिश्यतामिति ।
स ददर्श पुरो नम्रं लीलाद्वयमवस्थितम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा, जिसका शरीर शोभित हो रहा था,
विन्ध्याचल के समान बुद्धिमान था, उठा और मेघ के घोष के समान गम्भीर ध्वनि से उसने
“कौन है ?” कहा : दोनों लीलाओं ने उसके आगे जाकर “महाराज आज्ञा कीजिये"
कहा