Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 6, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 6, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

नह्येष दूरे नाभ्याशे नालभ्यो विषमे न च । स्वानन्दाभासरूपोऽसौ स्वदेहादेव लभ्यते ॥ ३ ॥ किंचिन्नोपकरोत्यत्र तपोदानव्रतादिकम् । स्वभावमात्रे विश्रान्तिमृते नात्रास्ति साधनम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

न बहुत नजदीक, न बहुत दूर, क्रिया के बिना प्राप्त होने के अयोग्य एवं विषम स्थान में स्थित फलकी प्राप्ति में क्रिया सफल हो सकती है, परमात्मा उक्त फलके सदश नहीं है, इसलिए वह क्रिया द्वारा कदापि लभ्य नहीं है, ऐसा कहते हैं। परमात्मा दूर भी नहीं है, नजदीक भी नहीं है, सुलभ भी नहीं है, दुर्लभ भी नहीं है और दुर्गम स्थान में स्थित भी नहीं है किन्तु विस्मृत सुवणहार की नाई ज्ञानरूप कौशल से अपने ही शरीर से प्राप्त होता है । परमात्मा की प्रप्ति में तपस्या, दान, व्रत आदि तनिक भी सहायता नहीं करते, केवल स्वरूप में विश्रान्ति को छोडकर उसकी प्राप्ति में ओर कुछ भी साधन नहीं हे