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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतत्ते कथितं राम दृश्यदोषनिवृत्तये । लीलोपाख्यानमनघं घनतां जगतस्त्यज ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

उनसठवाँ सर्म समाप्त साठवाँ सर्ग लीलोपाख्यान के प्रयोजन का विस्तार से वर्णन ओर काल आदि की समता ओर विषमता के कारण का निर्देश | श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, यह पवित्र लीलोपाख्यान, दुश्यरूप दोष की निवृत्ति के लिए, मैंने आपसे कहा यानी दृश्य नहीं है, इस प्रकार के ज्ञान से यदि मन से दृश्य का परिमार्जन हो गया, तो परम निवृत्ति प्राप्त हो गई, ऐसी जो प्रकरण के आरम्भ में प्रतिज्ञा की गई थी, उसकी सिद्धि ही लीलोपाख्यान का मुख्य प्रयोजन है अब आप जगत्‌ की सत्यता का त्याग कीजिये