Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verses 24–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verses 24–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 24-31
संस्कृत श्लोक
रात्रिं द्वादशवर्षाणि हरिश्चन्द्रोऽनुभूतवान् ।
लवणो भुक्तवानायुरेकरात्र्या समाः शतम् ॥ २४ ॥
यन्मुहूर्तः प्रजेशस्य स मनोर्जीवितं मुनेः ।
जीवितं यद्विरिञ्चस्य तद्दिनं किल चक्रिणः ॥ २५ ॥
विष्णोर्यज्जीवितं राम तद्वृषाङ्कस्य वासरः ।
ध्यानप्रक्षीणचित्तस्य न दिनानि न रात्रयः ॥ २६ ॥
न पदार्था न च जगत्सत्यमात्मनि योगिनः ।
मधुरं कटुतामेति कटुभावेन चिन्तितम् ॥ २७ ॥
कटु चायाति माधुर्यं मधुरत्वेन चिन्तितम् ।
मित्रबुद्ध्या द्विषन्मित्रं रिपुबुद्ध्या रिपुः सुहृत् ॥ २८ ॥
भवतीति महाबाहो यथासंवेदनं जगत् ।
अनभ्यस्ताः पदार्था ये शास्त्रपाठजपादयः ॥ २९ ॥
तेषां संवेदनाभ्यासान्नूनमभ्येति साम्यता ।
नौयायिनां भ्रमार्तानां वेदनाद्भूर्विवर्तते ॥ ३० ॥
अवेदनाभ्रमार्तानामपि नैषां विवर्तते ।
शून्यमाकीर्णतामेति वेदनात्स्वप्नदृक्ष्विव ॥ ३१ ॥
वेदनात्पीतमानीलं शुक्लं वाप्यनुभूयते ।
आपद्वदुत्सवः खेदं करोति परिमोहतः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा हरिश्चन्द्र को एक रात्रि बारह वर्ष की प्रतीत हुई थी, लवणासुर ने एक
रात्रि में सौ वर्ष की आयु का भोग किया था। जो मनु की आयु है, वह आत्मा का मनन करनेवाले
प्रजापति का एक मुहूर्त है । जो ब्रह्मा की आयु है, वह आत्ममननशील विष्णुका एक दिन है,
विष्णु की जो आयु है, वह शिवजी का एक दिन है, पर जिस पुरुषने ध्यान से अपने चित्त पर
विजय पा ली है यानी जो निर्विकल्प समाधि में स्थित है, उसके लिए न दिन हैं और न
रात्रियाँ। आत्म के चिन्तन में मग्न योगी की दृष्टि में न पदार्थ सत्य हैं और न जगत् ही सत्य हे ।
मधुर पदार्थ की भी यदि यह तीखा है, यह तीखा है, ऐसी भावना की जाय, तो वह भी तीखा हो
जाता है, यदि तीखे की यह मधुर है, यह मधुर है, इस प्रकार की भावना की जाय, तो वह मधुर
हो जाता है। हे महाबाहो, शत्रु ही क्यों न हो यदि यह मित्र है, मित्र है, यों मित्रबुद्धि से उसकी
भावना की जाय, तो वह मित्र बन जाता है, मित्र ही क्यों न हो, यह शत्रु है, ऐसी बुद्धि से उसकी
भावना की जाय तो शत्रु बन जाता है । यह सारा जगत् भावना का खेल है, जैसी भावना होती
है, वैसा ही दिखाई देता है । शास्त्राध्ययन, जप आदि जिन पदार्थो का पहले अभ्यास नहीं
रहता, उनमें भावना के अभ्यास से स्वाधीनता प्राप्त होती है। नौका से यात्रा करनेवाले चक्कर
आने से पीड़ित लोगों की भावना से पृथिवी घूमती है । भावनाअ्रमजनित पीड़ा से रहित तट में
स्थित लोगों की दृष्टि से तो वह नहीं घूमती, जैसे स्वप्न देखनेवालों की दृष्टि में शून्य स्थान
भी जनाकीर्णं प्रतीत होता है, वैसे ही भावना करने से भी शून्य स्थान लोगों से भरा हुआ-सा
प्रतीत होता हे