Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
गगने मानसं स्पन्दं जगद्विद्धि न वस्तु तत् ।
मिथ्याज्ञानपिशाचस्य स्पन्ददर्शनमाकृति ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण मन की समष्टि ओर व्यष्टि का कार्य होने से भी जगत् असत्य ही है, ऐसा कहते हैं ।
जिस बालक ने अपने मिथ्याज्ञान से पिशाच की कल्पना कर रक्खी है, उसका जो
स्पन्ददर्शन है, उसके तुल्य मनोमात्र आकृतिवाला यह जगत् आकाश में मानस स्पन्द ही
है, वास्तविक नहीं हे