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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 60, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 60, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

कारणत्वं मिथः पश्चादसदेति न वास्तवम् । मुक्तेऽस्मिन्ब्रह्मणि यदि ब्रह्मान्यः स्मृतिजो भवेत् । तत्स्मृतिज्ञप्तिजे सर्गे स्थितैव ज्ञप्तिमात्रता ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण जगत्‌ के आकार में परिणत पूर्व-पूर्व हिरण्यगर्भ में अहंबुद्धि की कल्पनारूप उपासना के संस्कार से उत्पन्न स्मृति से कल्पित होने से भी जगत्‌ अधिष्ठानभूत सन्मात्रसे अतिरिक्त नहीं है, ऐसा कहते है । इस ब्रह्मा के मुक्त होने पर यदि स्मृति से उत्पन्न हुआ अन्य ब्रह्मा हो, तो भी स्मृतिरूप ज्ञान से उत्पन्न सृष्टि में ज्ञप्तिमात्रता है ही