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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अहं जगदिति भ्रान्तिः परस्मात्कारणं विना । यथोदेति तथा ब्रह्मन्भूयः कथय साधु मे ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल विशुद्ध बोधमात्रस्वरूपवाले ब्रह्म की स्वरूपभूत विभा (प्रकाश) ही जैसे आकाश में उसकी अपनी शून्यता (आकाश की शून्यता) ही तन्मलिनता, मोतियों के समूहरूप, बालों के वर्तुलाकार गोले की आकारता और बड़े-बड़े कड़ाहों की आकारता से प्रतीत होती है, वैसे ही द्वैत ओर एेक्यविषयक संकल्पविकल्प करनेवाले मन से और उसके मूलभूत अविद्या, काम, कर्म, वासना आदि वश “अहं मम त्वं तव” इत्यादि जगत्‌ के रूप से प्रतीत होती है ॥६ ३॥ साठवाँ सर्ग समाप्त इकसठवों सर्ग तत्त्वज्ञान प्राप्तिरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिए एवं जगत्‌ के पदार्थो में वैराग्य होने के लिए सृष्टि की असारता ओर असत्यता का अन्यान्य युक्तिया द्वारा वर्णन । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, परब्रह्म को मैं देह हूँ, इत्याकारक अहंभाव से रहित देह में अहंभाव के कारण के बिना भी “अहम्‌ ऐसी भ्रान्ति ओर परमाणु तथा क्षण के मध्य में इस जगत्‌ की, जो कि बड़ा विस्तृत ओर चिरकालव्यापी प्रतीत होता है, स्थिति का कोई कारण नहीं हे, फिर भी उसमें "जगत्‌ ऐसी भ्रान्ति जेसी कल्पना ओर युक्ति से उदित होती है, इसे आप मुझसे फिर ऐसे ढंग से कहिये कि मेरी समझ में आ जाय