Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
शुद्धं सकृत्प्रभातान्तर्दृश्यमध्यमनामयम् ।
उदयास्तमयोन्मुक्तं ब्रह्म तिष्ठत्यनिष्ठितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो अशुद्ध, जड, देश और काल से परिच्छिन्न, दोषयुक्त, उत्पत्तिविनाशशील और
काल में स्थित है, वह काल से परिच्छिन्न होता है, ब्रह्म तो ऐसा है नहीं, इसलिए कहते हैँ ।
एक बार प्रकाशित न कि बीच बीच में रूक रूककर प्रकाशित यानी नित्य स्वप्रकाश, सृष्टि
और प्रलय जिसके अन्तर्गत हैँ, जन्म और विनाश से रहित तथा विक्रिया आदि दोषशून्य ब्रह्म
निराधार स्थित है