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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

सर्वा हि शब्दार्थदृशो ब्रह्मैवैताः पृथङ्ग तत् । सर्वार्थशब्दार्थकलारूपमासां न विद्यते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि किसीको यह शंका हो कि चैतन्य के अन्दर प्रतीत होनेमात्र से सव पदार्थो की सवत्मिता कैसे सिद्ध हो सकती है ? उसका उत्तर यह दिया जाय कि एकमात्र चित्‌ के (चैतन्य के) तादात्म्य से पदार्थो का स्फुरण होता है, अतः सब पदार्थ सर्वात्मक (चैतन्यात्मक) हैं, तो यह उत्तर भी ठीक नहीं जँचता, क्योकि घटज्ञान, पटज्ञान इस प्रकार विभिन्न विषयों के तादात्म्य से चैतन्य में भी भेदज्ञान होता है, अतः वह भी भिन्न हो जायेगा, इस आशंका के समाधान के लिए कहते हैं। चित्‌ का भेद नहीं हे । सब बोध, चाहे वे अर्थो के हों चाहे शब्दों के, ब्रह्म ही हे । चित्‌ भी ब्रह्म से अतिरिक्त नहीं है विषयनिष्ठ भेद के सम्बन्ध से चित्‌ में भेद प्रतीत होता है, विषय का निस्सारण होने पर चित्‌ में भेद नहीं रहता । शंका - उक्त अनुभव में विषयाकारता की प्रतीति होती है, अतः उसमें विषय के तुल्य भेद क्यो नहीं होता ? समाधान - सम्पूर्ण विषयरूप शब्दार्थ और उनके अवयवरूप जो तत्‌-तत्‌ आकार हैं, वे बोधों के नहीं हैं, क्योकि चित्‌ में जड़ आकार के रहने में कोई युक्ति नहीं है जो आकार अनुभव में आता है, वह वृत्ति का ही है; बोधों का नहीं, यह तात्पर्य है