Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 61, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 61, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
चितिं परापरामजामरूपिकामनामिकाम् ।
चराचराऽधरामयीं विदन्ति ये जयन्ति ते ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो लोग परा (ईश्वर-
चैतन्यरूप) अपरा (जीवचैतन्यरूप) क्रमश: ईश्वरचैतन्यरूप परा चिति को नामरूपात्मक
जगत्कल्पनारूप उपाधि से रहित और जीवचैतन्यरूप अपरा चिति को चराचर देह आदिरूप
निकृष्ट उपाधियों से शून्य और जन्म आदि विकारों से शून्य जानते हैँ, वे संसारपर विजय
पाते हैं यानी मुक्त हो जाते हैं