Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verses 29–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 62, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
नियत्या मूकतामेत्य निष्पौरुषतयाऽक्रियम् ।
यस्तिष्ठति प्राणमरुत्स्पन्दस्तस्य क्व गच्छति ॥ २९ ॥
अथ प्राणक्रियारोधमपि कृत्वा विरामदम् ।
यदि तिष्ठति तत्साधुर्मुक्त एव किमुच्यते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि जो पुरुष पौरुषशून्य होकर अजगरवृत्ति से रहे, उसको भी तो
तृप्ति आदि फललाभ होता है, ऐसा देखा गया है, इस पर कहते हैं ।
सचमुच देखा गया है, तथापि मुँह में ग्रास डालने ओर निगलने आदि कर्म से ही देखा गया
है, जो नियति से मुझे तृप्ति हो जायेगी, यों सोचकर मूक बनकर अकर्मण्य होकर पौरूषशून्य
रहता हे, वह कदापि तृप्त नहीं हो सकता । जो वह क्षुधासे व्याकुल होकर कुछ काल तक जीता
हे, वह प्राणचलन आदि पुरुषप्रयत्न से ही जीता हे । पौरुष के बिना कदापि तृप्ति आदि नहीं हो
सकते, यह भाव है