Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 62, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
मिथ्यात्मिकैव सर्गश्रीर्भवतीह महामरौ ।
तीरद्रुमलतोन्मुक्तपुष्पालीव तरङ्गिणी ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस महामरूरूपी जगत् में जैसे
मरूभूमि में तटवर्ती वृक्षों और लताओं से गिरे हुए फूलों की कतार से भरी हुई मिथ्या नदी
प्रतीत होती हे, वैसे ही सृष्टि शोभा भी मिथ्या ही है यानी मरूभूमि में पहले जलनदी ही मिथ्या
है फिर उसके तटवर्ती वृक्ष ओर लताएँ एवं उनके द्वारा बरसाये गये फूलों का समुदाय कहाँ ?
सारी की सारी परम्परा मिथ्या है, वैसे ही यह सृष्टिशोभा भी मिथ्या परम्पराओं से पूर्ण है