Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 62, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 62, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्तीह नियतिर्ब्राह्मी चिच्छक्तिः स्पन्दरूपिणी ।
अवश्यभवितव्यैकसत्ता सकलकल्पगा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राणियों की अदृष्ट शक्ति को साथ लेकर ईश्वरसंकल्परूप महानियति ही जैसे सम्पूर्ण
व्यवहारो की व्यवस्था करती हे, वैसे ही वही विद्वानों (ब्रह्मवेत्ताओं) के शरीर की भी स्थिति में
कारण होती है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, यहाँ पर सम्पूर्ण जगत् के सुव्यवस्थित व्यवहार से
रूपवती-सी ब्राह्मी चित्शक््ति है, जिसे नियति कहते हैं, वह अवश्यम्भाविनी और सम्पूर्ण
कल्पो में रहनेवाली है