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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 64, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

यथा वातस्य चलनं कृशानोरुष्णता यथा । शीतता वा तुषारस्य तथा जीवत्वमात्मनः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

जीवात्मा का जीवत्व जबतक मोक्ष नहीं होता, तबतक स्वाभाविक है, ऐसा कहते है । जैसे वायु का चलन स्वाभाविक है, जैसे अग्नि की उष्णता स्वाभाविक है ओर हिम की शीतलता स्वाभाविक है, वैसे ही आत्मा का जीवत्व भी स्वाभाविक है