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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 64, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 64, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

अहंभावो हि दिक्कालव्यवच्छेदी कृताकृतिः । स्वयं संकल्पवशतो वातस्पन्द इव स्फुरन् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

वायु के स्पन्द के समान स्फुरित हुआ अहंभाव आत्मा का दैशिक ओर कालिक परिच्छेद करता है, तथा स्वयं संकल्पवश उसने देह आदि का आकार धारण कर रक्खा है