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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 65, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 65, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

दीर्घः स्वप्नः स्थितिं यातः संसाराख्यो मनोबलात् । असम्यग्दर्शनात्स्थाणाविव पुंस्प्रत्ययो मुधा ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब यह चिरकाल तक कैसे स्थिर रहता है 2 इस पर कहते हैं। जैसे भलीभाँति न देखने से स्थाणु में (ठूँठ में) व्यर्थ ही पुरुषप्रतीति होती है, वैसे ही मन द्वारा की गई आसक्ति के बल से संसार नामका यह लम्बा स्वप्न अज्ञो को प्राप्त हुआ है