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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 66, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 66, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

यच्चेत्यते तदितरद्व्यतिरिक्तं चितोऽस्ति न । किंचिन्नास्तीतिसंशान्त्या चितः शाम्यति चेतनं ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका अनुभव होता है, वह चित्से अतिरिक्त जड़रूप नहीं है, यानी प्रतीतिकाल में भी द्वैतसत्ता नहीं हे । शंका : तब चित्त की शान्ति कैसे होती है ? समाधान : चित्त से अतिरिक्त जड़रूप कुछ नहीं है, यों दृश्यकी शान्ति होने पर विषय न रहनेपर निरिन्धन (काष्ठशुन्य) अग्नि के समान चित्त स्वयं शान्त हो जाता है