Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
मनस्त्वयोग्यो जीवोऽयं को भवेत्परमात्मनः ।
कथं वास्मिन्समुत्पन्नः को वायं वद मे पुनः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
समष्टि की प्रधानता से उक्त जीव को व्यष्टि की प्रधानता द्वारा स्पष्टरूप से जानने की
इच्छा करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी फिर पृषते है ।
भगवन् ! मन की सृष्टि करके “मेँ मन हूँ” यों मन के तादात्म्य का अपने में अध्यास करने
से मनस्ता के योग्य यह जीव परमात्मा का क्या है ? क्या परमात्मा का अंश है ? अथवा कार्य
है ? किंवा वह (परमात्मरूप) ही है ? यदि परमात्मा ही है, तो अपने में वह कैसे उत्पन्न
हुआ ? यानी क्या परिणाम से उत्पन्न हुआ या विवर्त से ? यदि अपने में परिणाम से उत्पन्न
हुआ है तो अनित्य हो जायेगा यदि विवर्त से उत्पन्न हुआ हे, तो वह बाध्य हो जायेगा । यदि
अपने में उत्पन्न नहीं हुआ है, तो भोक्ता की सिद्धि नहीं होगी, क्योकि परमात्मा से अतिरिक्त
द्वितीय कोई है नहीं और परमात्मा मेँ अशना (भूख) आदि का अभाव श्रुति स्वयं कहती है,
इसलिए परमात्मा को भोक्ता कह नहीं सकते । यदि भोक्ता कोई अन्य है, तो वह कौन है ?
क्या परमात्मा सजातीय है या विजातीय है यों एक भी पक्ष संगत नहीं होता, इसलिए मेरे
सन्देह को हटाने के लिए आप पुनः कहिए
सर्ग सन्दर्भ
छासठवाँ सर्ग समाप्त सड़सठवाँ सर्ग भोक्ता जीव के स्वरूपका प्रतिपादन ।