Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सर्वमेव मनोमात्रभ्रान्त्युल्लासविजृम्भणम् ।
इदं जगत्तया राम प्रस्फुरत्यम्बुभङ्गवत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे
जल तरंगरूप से स्फुरित होता है, वैसे ही मन की भ्रान्ति का प्रचुर उल्लासरूप यह सब
जगत्रूप से स्फुरित होता है