Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अहो चित्रं जगदिदमसत्सदिव भासते ।
अहो बृहदहो स्वस्थमहो स्फुटमहो तनु ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार वर्णित जीव, मन, बुद्धि और अहंकारस्वरूप जगत् की मायामात्रता को सुनकर
आश्चर्यमग्न हुए, युरुवचनों में विश्वास होने के कारण स्वयं अनुवाद द्वारा उसका अनुमोदन
करते हुए पंचभूत और तन्मात्राओं के इन्द्रियों सहित समष्टि, व्यष्टि, ओर स्थूल-शरीरभाव
के उत्पत्तिक्रम को जानने के लिए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।
भगवन्, अहो बड़े आश्चर्य की बात है कि यह जगत् स्वयं असत् हो कर भी सत्-सा
प्रतीत होता हे, क्षुद्र होता हुआ भी यह कैसा विस्तृत, कैसा स्वस्थ और कैसा स्पष्ट प्रतीत
होता है ? यह कम आश्चर्य की बात नहीं है