Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 67, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
इदमेवमसत्सर्वमिव व्योम्नि ततात्मनि ।
पर्वतोच्चाकृतिर्व्योम जगद्व्योम्नि विजृम्भते ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार व्यष्टि के संकल्प के अनुसार समष्टि का संकल्पस्वरूप यह जगत् मिथ्या ही
है, ऐसा फलितार्थ कहते है ।
व्यापक आकाश में यह सब तलमलिनत्व आदि के समान कल्पित है और जब मेरु आदि
पर्वतो की उन्नत आकृति भी आकाश ही है, फिर छोटो मोटोंकी तो बात ही क्या है, क्योकि
वायु आदि के क्रम से सम्पूर्ण जगत् आकाश में ही आरोप द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुआ है, अतः
उसमें ओर तलमलिनता आदि में क्या अन्तर है ?