Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 68, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 68, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
आलोक्य तां पवनजर्जरिताङ्गकत्वक् चीराङ्गणाकृतिरणत्पवनावधूतैः ।
ऊर्ध्वस्थमूर्धजतमःपटलैर्दधानां तारोघमौक्तिकमजः समुपाजगाम ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
शीत, उष्ण ओर धूलि से रुक्ष वायु से शिथिल हुए उसके कृश अंगों की लटक
रही त्वचा ही उसका वस्त्र था, एक बड़ी सेना के सदुश उसका आकार था, शब्दायमान वायुओं
द्वारा हिलाये गये ओर खड़े केशरूपी अन्धकारपटल से तारा रूपी मुक्तामाला को धारण कर
रही उसको देखकर वर देने के लिए ब्रह्माजी उसके पास आए