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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 69, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 69, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

मनसैव प्रणम्यैनं सा तथैव स्थिता सती । को वरः क्षुच्छमायालमिति चिन्तान्विताभवत् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वह मन से ही ब्रह्माजी को प्रणाम कर वैसे ही स्थित रही, उसने मन में विचार किया कि मेरी भूख की शान्ति के लिए कौन वर उत्तम होगा