Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 19–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
देशाद्देशान्तरं दूरं प्राप्तायाः संविदो वपुः ।
निमिषेणैव यन्मध्ये तद्रूपं परमात्मनः ॥ १९ ॥
अत्यन्ताभाव एवास्ति संसारस्य यथास्थितेः ।
यस्मिन्बोधमहाम्भोधौ तद्रूपं परमात्मनः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
निर्विषय ज्ञान अप्रसिद्ध है, अतः वह निर्विषय, अनावृत्त ओर अपरोक्ष चिद्रूप है, ऐसा
कहनेपर भी वह अनुभव में आरूढ नहीं हो सकता, इसलिए जैसे वह अनुभवारूढ हो, वैसे
कहते हैं।
श्री वसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, एक पलक भर में एक देश से दूर अन्य देशमें
प्राप्त संवित् (ज्ञान) का निर्विषय मध्यवर्ती यानी निकट और दूर देश के मध्य में स्थित जो
स्वरूप है, वही परमात्मा का रूप हे । भाव यह कि शाखा के अग्रभागमें चन्द्रमा के दर्शनमें नेत्र
द्वारा निर्गत अन्तःकरणाभिव्यक्त अपरोक्ष ज्ञान शाखा प्रदेश से लेकर दूर चन्द्र प्रदेशतक एक
पलक भर में पहुँच जाता है। शाखा प्रदेश से लेकर चन्द्र-प्रदेश तक उक्त ज्ञानकी अनुस्यूतता
माने बिना शाखा और चन्द्रमा का एक साथ ज्ञान नहीं हो सकता, उसकी उपपत्ति के लिए
शाखा से चन्द्र तक ज्ञान की अनुस्यूतता अवश्य माननी चाहिए | वहाँ पर शाखा और चन्द्र
प्रदेशमें ज्ञानके सविषय होने पर भी बीचमें उक्त ज्ञानका जो स्वरूप है, वह निर्विषय अपरोक्ष
चिद्रूप से प्रसिद्ध है, वही परमात्मा का भी रूप समझना चाहिए । जिस ज्ञानरूप महासागर में
नाश आदि विकार के बिना ही अपने अधिष्ठान में मिथ्यात्व को प्राप्त होनेवाले संसारका
अत्यन्त अभाव ही है, वह परमात्मा का स्वरूप है