Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
द्रष्टृत्वं सति दृश्येऽस्मिन्दृश्यत्वं सत्यथेक्षके ।
एकत्वं सति हि द्वित्वे द्वित्वं चैकत्वयोजने ॥ ३५ ॥
एकाभावे द्वयोरेव सिद्धिर्भवति नात्र हि ।
द्वित्वैक्यद्रष्टृदृश्यत्वक्षये सदवशिष्यते ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसा कि ऊपर कहा गया है, सूक्ष्म चिन्मात्र ब्रह्म में विशाल
जगत् का अध्यास होना सरसों के पेटमें सुमेरु के समा जाने के समान असम्भव है, वह कथन
ठीह होता यदि जगत् की स्थूलता विचार सह होती, किन्तु जगत् की स्थूलता ही विचारसह
नहीं है । जब आपकी जगत् में स्थूलता प्रतीति को ही हम लोग युक्तियो द्वारा दीर्घ कालमें
शिथिल करेगे, तब हमारा कथन आपके हृदयमे जम सकेगा, इस अभिप्राय से श्रीवसिष्टजी
बोले : वत्स श्रीराम, यदि आप अनुद्धिग्नचित्त होकर कुछ दिनों तक साधुसंग और सत्- शास्त्रों
के अभ्यासमें परायण रहेंगे, तब मैं एक क्षण में जैसे ज्ञान होने पर मृगजल नष्ट हो जाता है,
वैसे ही आपके इस दृश्य को विनष्ट कर दुगा । दृश्य का अभाव होने पर द्रष्टता भी शान्त हो
जायेगी, केवल बोध ही अवशिष्ट रह जायेगा ॥३३, ३ ४॥
दृश्य द्वैतका अभाव होने पर केवल द्रष्टाका ही अभाव नहीं होता, किन्तु द्वित्व ओर एकत्व
का भी अभाव हो जाता है, ऐसा उपपादन करते है।
इस दृश्य के रहने पर द्रष्टृत्व रहता हे ओर द्रष्टा के रहनेपर दुश्यत्व रहता हे । द्वित्व आदि
के अत्यन्त प्रसिद्ध रहनेपर उनकी व्यावृत्ति के लिए एकत्व की कल्पना होती हे । व्यावर्त्य ही
जब प्रसिद्ध नहीं हे, तब किसकी व्यावृत्ति के लिए उसकी कल्पना की जाय । एकत्व का योग
होने पर ही द्वित्व होता हे । उक्त दो में से एक के अभाव में दोनों की ही सिद्धि नहीं होती । द्वित्व,
एकत्व, द्रष्टूत्व ओर दुश्यत्वका क्षय होने पर केवल सन्मात्र ही अवशिष्ट रहता हे