Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 7, Verses 42–45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 7, verses 42–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 7 · श्लोक 42-45

संस्कृत श्लोक

आदावेव हि नोत्पन्नं यत्तस्येहास्तिता कुतः । कुतो मरौ जलसरिद्द्वितीयेन्दौ कुतो ग्रहः ॥ ४२ ॥ यथा वन्ध्यासुतो नास्ति यथा नास्ति मरौ जलम् । यथा नास्ति नभोयक्षस्तथा नास्ति जगद्भ्रमः ॥ ४३ ॥ यदिदं दृश्यते राम तद्वह्मैव निरामयम् । एतत्पुरस्ताद्वक्ष्यामि युक्तितो न गिरैव च ॥ ४४ ॥ यन्नाम युक्तिभिरिह प्रवदन्ति तज्ज्ञास्तत्रावहेलनमयुक्तमुदारबुद्धे । यो यक्तियुक्तमवमत्य विमूढबुद्धिः कष्टाग्रहो भवति तं विदुरज्ञमेव ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

का पुत्र नहीं हे, जैसे मरूभूमि में जल नहीं है ओर जैसे आकाश में वृक्ष नहीं हे, वैसे ही जगद्भ्रम भी नहीं है । हे श्रीरामजी, जो कुछ यह दिखाई देता है, वह सब निर्मल ब्रह्म ही है, इसको मैं आगे केवल उपदेश से ही नहीं आख्यान आदि युक्‍क्तियों से भी कहूँगा। उदारबुद्धे, तत्त्वज्ञ पुरुष जिस बात को युक्तियों द्वारा सिद्ध करते हैं, उसकी उपेक्षा करना उचित नहीं है । जो मूढबुद्धि पुरुष युक्तियुक्त तत्त्व का अनादर कर युक्तिशून्य वस्तु में आग्रह करता है, उसे विद्वान्‌ लोग अज्ञ ही समझते हैं