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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

वेधं पूररयेणेव करोति स्वं प्रचारिता । प्रकृतेन निजेनापि वेधाय व्यवहारिता ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि उसको पश्चाताप हुआ तो क्या वह प्राणियों के विघात से विरत हो गयी ? नहीं, ऐसा कहते हैं। यद्यपि उसको पश्चात्ताप हुआ था, तथापि नदी के प्रवाह के वेग के तुल्य अपने राक्षसस्वभाव से ओर प्रकृत सूचीभाव से भी, जिसका प्राणियों के वेधन में आग्रह था, प्राणियों के वेधन के लिए ही अपने स्वभाव के अनुरूप प्रचारित-पहले उद्यत की गई और फिर व्यवहार में लाई गई-भी वह वेध को करती ही थी