Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verse 68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
मिश्रिता मूढचित्तानां वृत्तिभिः प्राकृते जने ।
तिष्ठत्यात्मसमां को हि संगतिं त्यक्तुमिच्छति ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए मूर्खो की चित्तवृत्ति के साथ भी संगति उसे अच्छी लगती है, ऐसा कहते हैं।
मूढ़ लोगों की वृत्तियों से मिली हुई वह प्राकृतजनों में रहती है, अपनी अनुरूप संगति को
कौन छोड़ सकता है ?