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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 70–72

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 70, verses 70–72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 70-72

संस्कृत श्लोक

प्राणापानप्रवाहस्थहृत्पद्मान्तरचारिणी । दुःखशक्तिर्महाघोरा जीवशक्तिरिवोदिता ॥ ७० ॥ समानवैपरीत्येन समानसमगामिनी । उदानविपरीतत्वादुदानसमगामिनी ॥ ७१ ॥ व्यानस्था व्याधिजननी सर्वाङ्गरसचारिणी । हृत्कण्ठे शूलपवने वैवर्ण्योन्मादकारिणी ॥ ७२ ॥

हिन्दी अर्थ

उसका प्राणियों के प्राण आदि वायुओं द्वारा देह के अन्दर संचार होता है, ऐसा कहते हैं। प्राण ओर अपान वायु के प्रवाह में स्थित होकर लोगों के हृदयकमल के अन्दर संचरण करनेवाली यह महाघोर दुःखप्रद कर्मशक्तिरूप ही मानों सजीव होकर उदित हुई है। समान वायु के विपरीत होने पर भी समान के साथ चलनेवाली, उदानवायुके विपरीत होने पर भी उदान के साथ चलनेवाली ओर व्यान वायु में स्थित होकर सर्वाग मेँ संचरण करनेवाली और विविध व्याधियों को उत्पन्न करनेवाली यह सूचिका हृदयमें, कण्ठमें शुलरोगात्मक वायु में प्रवेश करके विवर्णता (पांड़रोग) और उन्माद रोग को उत्पन्न करती है