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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 71, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 71, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

परप्रैषकरी नित्यं परसंचारचारिणी । परं कार्पण्यमायाता जाता परवशास्म्यलम् ॥ १४ ॥ भ्रान्तिं करोमि तुच्छे च सापि वेधनरूपिणी । अहो ममाल्पभाग्याया दौर्भाग्यमपि दुर्भगम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं नित्य दूसरे की चाकरी बजाती हूँ, दूसरे जब मुझे चलाते हैं, तब मैं चलती हूँ, अत्यन्त दीनता को प्राप्त हुई मैं अत्यन्त परवश हो गई हूँ, तुच्छ के यानी भीतर स्थित रक्त आदि के आस्वाद की मुझे इच्छा होती है, परन्तु वह इच्छा भी वेधनरूपिणी ही है यानी उसका फल केवल वेधन ही है, क्योकि न मुझे पेट है और न जिह्वा है । मैं बड़ी मन्दभागिनी हूँ, मेरा दुर्भाग्य भी बड़ा अभागा है