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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 72, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

नागाः श्वसन्ति विचलन्ति नगाः पतन्ति वैमानिका जलधिवारिधराः प्रयान्ति । शोषं दिशोऽर्कसहिता मलिनीभवन्ति सूच्याः सुरेन्द्र तपसा क्षयमाययेव ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

॥ हे इन्द्र, भगवान्‌ रुद्र की संहारशक्ति के समान सूची की तपस्या से हाथी निःश्वास छोड रहे हैं, पर्वत विचलित हो रहे हैं, विमान से चलनेवाले देवता वगैरह गिर रहे हैं, सागर तथा मेच सूख रहे हैं तथा सूर्य के साथ दिशाएँ मलिन हो रही हैं