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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 17–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

तरुगुल्मौषधादीनां हृदौजान्यनिलश्रिया । परिभुक्तान्यशुक्लानि हिंसयोधीकृतानि च ॥ १७ ॥ अथो जीवमयी सूची स्यामिति स्थावरेण सा । संपन्ना तापसी सूची चेतना पावनी सिता ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

वायुरूप हुई उसने वृक्ष, लता, ओषधि आदि के रस (निर्यास) आदि का उपभोग किया ओर हिंसा से इकडे किये हुए काले, पीले आदि अशुद्ध रसों का उपभोग किया, इसके बाद “मे जीवमयी सूची होऊँ” इस प्रकार खम्भे के समान अटल तपश्चर्या के संकल्प से तपस्विनी वह सूची चेतना, पावनी ओर शुद्ध हो गई