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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 73, Verses 8–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 73, verses 8–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 73 · श्लोक 8-11

संस्कृत श्लोक

सुप्तं विवलितानल्पमालया मुग्धबालया । कान्तवक्षःस्थलस्यूतसृष्टपत्रकपोलया ॥ ८ ॥ विद्रुतं वीतशोकासु विहङ्गा वनवीथिषु । कल्पद्रुमौघपुष्पाग्रद्विगुणाम्भोजपङ्क्तिषु ॥ ९ ॥ पीत आमोदमन्दारमकरन्दकणासवः । वनेष्वमरशैलानामलिन्यामलिलीलया ॥ १० ॥ चर्वितानि शवाङ्गानि गृध्र्याऽऽगर्तानि वृद्धया । खड्गपृष्ठ्येव संग्रामे वीराङ्गानि जवेद्धया ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

पति के वक्षःस्थल में जिन्होंने मछली आदिके आकार के पत्रों को संक्रामित किया है, ऐसे कपोलों से युक्त ओर कान्त के आलिंगन से जिसकी मालाएँ मर्दित हो गई हों, ऐसी मुग्ध बाला के समान वह सोई रही यानी मुग्ध बाला के सुख का भी उसने अनुभव किया । कल्पवृक्षो के पुष्पो से भी श्रेष्ठ अतएव द्विगुण सुगन्धवाले कमलों से पूर्ण शोकरहित वनभूमियों में पश्षीके शरीर में प्रविष्ट हुई उसने लम्बी उड़ान मारी । भँवरी के शरीर मेँ प्रविष्ट होकर भरमर के साथ विहार करती हुई उसने खूब सुगन्धित मन्दारवृक्ष के मकरन्द (पुष्परस) रूपी आसव का देवताओं के पर्वतो के वनों में पान किया, संग्राम में वेग से चमक रही तलवार की धार जैसे वीर पुरुषों को चवा डालती है, वैसे ही गीध की देहमें प्रविष्ट हुई उसने क्षतरूपी गर्तो से युक्त शवों के शरीर चवा डाले