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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 77, Verses 12–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 77, verses 12–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 77 · श्लोक 12-15

संस्कृत श्लोक

गुहासु सुप्तसिंहाढ्या कुञ्जेषु स्वपदेणका । खे सावश्यायनिकरा विपिने मौनचारिणी ॥ १२ ॥ कज्जलाम्भोदमध्याभा काचशैलोदरोपमा । पङ्कपिण्डान्तरघना खड्गच्छेद्यान्ध्यमांसला ॥ १३ ॥ प्रलयानिलविक्षुब्धकज्जलाचलचञ्चला । एकार्णवमहापङ्कपर्वतोदरमेदुरा ॥ १४ ॥ अङ्गारकोटरघना सौषुप्तपदसुन्दरी । अज्ञाननिद्रानिबिडा भृङ्गपृष्ठच्छदच्छविः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

के पर्वत के तुल्य चंचल थी, प्रलयकालीन एकमात्र समुद्र के पंक के पर्वत के मध्यभाग के समान वह स्थूल थी, कोयलों की भटी के समान वह निविड काली थी, महाअज्ञान के समान वह घनी थी और भौरों की पीठ ओर परो के समान उसकी श्यामल कान्ति थी