Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्वेनेव व्यवहारेण कार्यं सिद्ध्यतु वा न वा ।
महानियतिरित्येव भ्रमस्यावसरो हि कः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
कार्य की सिद्धि में सन्देह होने पर भी उक्त अनादि नियम से सिद्ध सामरूप उपाय का
त्याग नहीं करना चाहिए, फिर कार्य की सिद्धि का निश्चय होने पर तो कहना ही क्या है ? ऐसा
कहते हैं।
अपने ही व्यवहार से कार्य सिद्ध हो अथवा न हो, सामका ही व्यवहार करना चाहिए, यह
महानियति का (पण्डितों को शान्ति से ही व्यवहार करना चाहिए, इस अनादि नियमका)
निश्चय है, इस विषयमें भ्रान्तपुरुषोचित कोप का अवसर ही कहाँ है ?