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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 78, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 78, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

एकोपायेन मत्पार्श्वाद्वालकावुत्तरिष्यथः । मत्प्रश्नपञ्जरं सारं चेद्विचारयथो धिया ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

एक ही उपाय से मेरे पाप से तुम लोग मुक्त हो सकते हो । जैसे बालक अपनी माता पिताके प्रीतिपात्र होते हैं, वैसे ही तुम लोग मेरे प्रीतिपात्र होओगे, यदि मेरे ठोस प्रश्नों का बुद्धि से विचार करोगे